Friday, February 28, 2020

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भारत में हर साल किसी ना किसी हिस्से में चुनाव चलते रहते हैं। इन चुनावों में विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाते हैं। हर बार जनता भी इन्हें इस उम्मीद में जीत दिला देती है कि शायद इस बार उनकी तरफ कोई ध्यान देगा लेकिन नेताओ की फिर वही बेरुखी और भ्रष्टाचार।
हमारे देश में विभिन्न तरह के चुनाव होते हैं और इन सब में सबसे बड़ा चुनाव लोकसभा का होता है जो कि अभी आने वाला है। लोकसभा चुनाव के लिए सभी क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दल और निर्दलीय अपनी पूरी ताकत के साथ जनता को हर बार की तरह फिर से गुमराह करने में लगे हुए हैं।
हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और इस लोकतंत्र में व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ नियम कायदे कानून बनाए गए हैं कुछ शक्तियां चुनाव में हिस्सा लेने वाले दलों को उन निर्दलीय व्यक्तियों को दी गई है। हमारे देश में सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को बहुमत सिद्ध करना होता है अगर कोई पार्टी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाती है तो उसे अन्य पार्टियों या निर्दलीय व्यक्तियों के साथ गठबंधन करके बहुमत सिद्ध करके सरकार बनाने का मौका दिया जाता है।
दुर्भाग्य है कि ज्यादातर लोकतांत्रिक शक्तियों का इस्तेमाल देश के हित ना करके अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए किया जाता है। इसका एक जीवित उदाहरण है विपक्षी पार्टियों के द्वारा आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एकजुट होकर सिर्फ और सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को हटाना।
मौजूदा समय में ऐसा ही एक गठबंधन सपा और बसपा में हुआ है। सपा और बसपा दोनों ही धुर विरोधी पार्टियां हैं। एक समय था जब बसपा की मायावती को सपा के मुलायम सिंह यादव एंड पार्टी से अपनी जान का खतरा था। एक बहुचर्चित कांड जिसे गेस्ट हाउस कांड के नाम से जाना जाता है उसमें मायावती को अपनी आबरू के साथ अपनी जान बचाना भी भारी पड़ गया था अब उस दिन वास्तव में क्या हुआ था या क्या होने वाला था यह तो मायावती या मुलायम सिंह यादव ही भली-भांति जानते होंगे। लेकिन एक बात तो तय है उस घटना के बाद से ही दोनों पार्टियों के बीच में 36 का आंकड़ा बन गया था और तब से ही दोनों पार्टियां एक दूसरे के प्रति